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ऋग्वेद संहिता का हिंदी अनुवाद
जब मैंने सायण आचार्य के भाष्य पर आधारित ऋग्वेद का अनुवाद किया था, उस समय मुझे आशा नहीं थी कि प्राचीन भारतीय संस्कृति को जानने की इच्छा रखने वालों को यह इतना अधिक रुचिकर लगेगा। मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए यह गौरव की बात है। विद्वान्, चिंतक एवं मनीषी पाठकों ने अब तक किसी त्रुटि एवं असंगति का संकेत नहीं किया है, इससे मैं अनुमान लगाने का साहस कर सकता हूं कि इस ग्रंथ का अनुवाद, मुद्रण आदि संतोषजनक है।
अनुवाद का आधार
इस ग्रंथ में ऋग्वेद की ऋचाओं का वह अनुवाद दिया हुआ है, जो अर्थ सायणाचार्य को अभीष्ट था। इस अनुवाद का आधार सायण का भाष्य है। उन्होंने जिस शब्द का जो अर्थ बताया है, वही मैंने इस अनुवाद में देने का प्रयत्न किया है। मैंने अनुवाद करने के लिए चारों वेदों में से ऋग्वेद और ऋग्वेद के अनेक भाष्यों में से सायण भाष्य ही क्यों चुना, इसका उत्तर देने में मुझे संकोच नहीं है।
ऋग्वेद का महत्त्व
ऋग्वेद भारतीय जनता एवं आर्य जाति की ही प्राचीनतम पुस्तक नहीं, विश्व की सभी भाषाओं में सबसे पुरानी पुस्तक है। सबसे प्राचीन संस्कृति-वैदिक संस्कृति- के प्राचीनतम लिखित प्रमाण होने के कारण ऋग्वेद की महत्ता सर्वमान्य है। मैं इस विवाद में पड़ना नहीं चाहता कि ऋग्वेद की ऋचाओं का ऋषियों ने ईश्वरीय ज्ञान के रूप में साक्षात्कार किया था या उन्होंने स्वयं इनकी रचना की थी। वैसे ऋग्वेद में समसामयिक समाज का जिस ईमानदारी, विस्तार एवं तन्मयता से वर्णन किया गया है, उससे मेरा व्यक्तिगत विश्वास यही है कि ऋषियों ने समयसमय पर इन ऋचाओं की रचना की होगी।
सायण भाष्य का चयन
सायण के अतिरिक्त ऋग्वेद पर वेंकट माधव, उद्गीथ, स्कंदस्वामी, नारायण, आनंद तीर्थ, रावण, मुद्गल, दयानंद सरस्वती आदि अनेक विद्वानों ने भाष्य लिखे हैं। इनमें किसी का भाष्य पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है। केवल सायण ही ऐसे विद्वान् हैं, जिन्होंने चारों वेदों पर पूर्ण भाष्य लिखा है और वह उपलब्ध है। सायण का जीवनकाल चौदहवीं शताब्दी है। वह विजयपुर नरेश हरिहर एवं बुक्क के मंत्री रहे थे। प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ ‘माधव निदान’ लिखने वाले माधव आचार्य इन्हीं के भाई थे।
सायण के भाष्य का महत्त्व
किसी भी शब्द का अर्थ जानने में परंपरागत ज्ञान का बहुत महत्त्व है। सायण को ऋग्वेद के परंपरागत अर्थ को जानने की सुविधा बाद में होने वाले आचार्यों से अधिक थी। यह निर्विवाद है। मंत्री होने के कारण सभी पुस्तकों की प्राप्ति और विद्वानों की सहायता उन्हें सहज सुलभ थी। सायण ने ऋचाओं के प्रत्येक शब्द का विस्तार से अर्थ किया है। प्रत्येक शब्द की व्याकरणसम्मत व्युत्पत्ति की है तथा उन्होंने निघंटु, प्रातिशाख्य एवं ब्राह्मण ग्रंथों के उदाहरण देकर अपने अर्थ की पुष्टि की है। इस प्रकार सायण का अर्थ निराधार नहीं है।
वैदिक मंत्रों के अर्थ
वैदिक मंत्रों के अर्थ जानने के हेतु यास्क आचार्य ने तीन साधन बताए हैं:
- आचार्यों से परंपरा द्वारा सुना हुआ ज्ञान एवं ग्रंथ।
- तर्क।
- मनन।
सायण ने इन तीनों का ही सहारा लेकर अपना भाष्य लिखा है। सायण की कोई धारणा अथवा जिद नहीं जान पड़ती। कुछ अन्य आचार्यों के समान उन्होंने सभी मंत्रों का आधिभौतिक, आध्यात्मिक या आधिदैविक अर्थ नहीं किया है। कुछ आचार्यों का यहां तक विश्वास रहा है कि प्रत्येक वैदिक मंत्र के उक्त तीनों प्रकार के अर्थ संभव हैं। सायण ने प्रसंग के अनुकूल कुछ मंत्रों का मानव जीवन संबंधी, कुछ का यज्ञ संबंधी और कुछ का आत्मापरमात्मा संबंधी अर्थ दिया है। सायण के अनुसार, अधिकांश मंत्रों का अर्थ मानव जीवन संबंधी ही है। शेष दो प्रकार का अर्थ उन्होंने बहुत कम मंत्रों का किया है। इस प्रकार एकमात्र सायण ही ऐसे भाष्यकर्त्ता हैं, जिन्होंने किसी वाद का चश्मा लगाए बिना वैदिक मंत्रों का अर्थ किया है। उनका भाष्य साधारण व्यक्ति को वेदार्थ समझने में भी सहायक है। इन्हीं सब कारणों से मैंने अपने अनुवाद का आधार सायण भाष्य को बनाया है।
ऋग्वेद का विभाजन
ऋग्वेद का विभाजन दस मंडलों में किया गया है। प्रत्येक मंडल में बहुत से सूक्त एवं प्रत्येक सूक्त में अनेक ऋचाएं हैं। मैंने अनुवाद में केवल यही विभाजन दिया है। वैसे प्रत्येक मंडल कुछ अनुवाकों में विभक्त है। अनुवाक सूक्तों में बांटे गए हैं। संपूर्ण ऋग्वेद को चौसठ अध्यायों में विभक्त करके उनके आठ अष्टक बनाए गए हैं। प्रत्येक अष्टक में आठ अध्याय हैं। सायण ने ये सब विभाजन दिए हैं। उनके भाष्य में अष्टकों एवं अध्यायों को ही प्रमुखता दी गई है। एक तो यह विभाजन कृत्रिम है, दूसरे इससे व्यर्थ का भ्रम होता है, इसलिए मैंने इनका उल्लेख नहीं किया है।
ऋग्वेद की मूल ऋचाएं
संहिता अथवा भाष्य में प्रत्येक मंत्र के ऋषि, देवता, छंद और विनियोग का उल्लेख है। ऋषि का तात्पर्य उस मंत्र के निर्माता या द्रष्टा ऋषि से है। देवता का अर्थ है- विषय। यह देवता शब्द के वर्तमान प्रचलित अर्थ से सर्वथा भिन्न है। ऋग्वेद के देवता सपत्नी (सौत), द्यूत (जुआ), दरिद्रता, विनाश आदि भी हैं। छंद से तात्पर्य उस सांचे या नाप से है जिस में वह मंत्र निर्मित है। विनियोग का तात्पर्य है- प्रयोग। जो मंत्र समयसमय पर जिस काम में आता रहा, वही उस का विनियोग रहा। वैदिक मंत्रों का अर्थ समझने में देवता (विषय) ही आवश्यक है। इसलिए मैंने केवल देवता का ही उल्लेख किया है।
ऋग्वेदकाल का समाज
वैदिक आर्यों का समाज पूर्णतया विकसित एवं उन्नत समाज था। यदि ऋग्वेद में वर्णित बातों को मानव जीवन संबंधी स्वीकार किया जाए तो आर्यों का जीवन सभी प्रकार से पूर्ण था। ऋग्वेद में कुछ वस्तुओं एवं पशुपक्षियों के नाम एवं वर्णन साक्षात् रूप से आए हैं और कुछ का उल्लेख अलंकार रूप में हुआ है। वर्णन चाहे किसी भी रूप में हो, पर इतना सिद्ध हो जाता है कि ऋग्वेदकाल के लोग इन सब बातों को जानते थे। कुछ बातें उन्होंने प्रत्यक्ष देखी थीं और कुछ की उन्हें कल्पना हो सकती है।
ऋग्वेद में वर्णित जीवन
कवच, लोहे का द्वार, सोने अथवा लोहे की नकदी, सुसज्जित सेना, ढाल-तलवार, कारावास, हथकड़ी-बेड़ी, आकाश में उड़ने वाला बिना घोड़ों का रथ, सौ पतवारों वाली नाव, लोहे का नकली पैर, अंधे को आंखें मिलना, बूढ़े का दोबारा जवान होना, जुआ खेलना, व्यभिचारिणी स्त्री का दूर जाकर गर्भपात करना, कामुकी नारी का संकेतस्थल पर आना, कन्या के पिता द्वारा कन्या को अलंकृत करना, लकड़ी का संदूक, घोड़ा चलाने का चाबुक, लगाम, अकुंश, सुई, कपड़ा बुनने वाला जुलाहा, घड़ा बनाने वाला कुम्हार, रथकार, सुनार, किसान, तालाब से सिंचाई, हल जोतना आदि ऐसी बातें हैं, जो वैदिक आर्यों को सभी प्रकार विकसित सिद्ध करती हैं।
ऋग्वेद की आधुनिक प्रासंगिकता
कुछ लोगों को ऋग्वेद में व्यभिचारिणी स्त्री, गर्भपात, प्रेमी और प्रेयसी, कामी पुरुष, कामुकी नारी, कन्या के पिता या भाई द्वारा उत्तम वर पाने हेतु दहेज देना, अयोग्य वर का उत्तम वधू पाने हेतु मूल्य चुकाना, चोर, जुआरी, विश्वासघातक मित्र आदि का उल्लेख अनुचित लग सकता है। इन शब्दों के वे दूसरे अर्थ करेंगे एवं तत्कालीन समाज में इन बातों को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। मैं वास्तविकता बताने के लिए उनसे क्षमा चाहूंगा, मेरा दृढ़ विश्वास है कि एक बुद्धिप्रधान एवं विचारशील विकसित समाज में ये बातें होनी स्वाभाविक हैं।
ऋग्वेद के दैनिक जीवन का चित्रण
दिनभर जंगल में चरकर घरों को लौटती गाय, रस्सी से बंधे बछड़े का
रंभाना, गाय का दूध दुहना, छाछ बिलोना, कच्चे मांस पर मक्खियों का बैठना, चिड़ियों का चहचहाना आदि पढ़कर ऐसा लगता है कि भारत के गांवों में आज भी वैदिक जीवन की झलक मिल जाती है। नागरिकता का विस्तार एवं विज्ञान की पहुंच उसे विकृत कर रही है। आर्य मुख्यतया कृषि जीवी एवं ग्रामों में रहने वाले लोग ही थे। बाद में उन्होंने नगर भी बसाए, पर ऋग्वेद में अधिकांश नगर शत्रु नगरों के रूप में बताए गए हैं।
निष्कर्ष
ऋग्वेद संहिता का यह अनुवाद सायण आचार्य के भाष्य पर आधारित है और इसका उद्देश्य प्राचीन भारतीय संस्कृति को सरल एवं सटीक रूप में प्रस्तुत करना है। वैदिक मंत्रों के अर्थ और ऋग्वेदकाल के समाज की प्रासंगिकता को समझने में यह अनुवाद सहायक सिद्ध होगा।त उपयोगी है। आशा है कि इस संक्षिप्त परिचय से पाठकों को अथर्ववेद की महत्ता और उसकी विषय वस्तु की गहराई का एक आभास मिला होगा।
ऋग्वेद संहिता हिंदी पीडीऍफ़ ( Rigveda PDF Hindi Book) के बारे में अधिक जानकारी:-
Name of Book | ऋग्वेद संहिता | Rigveda PDF |
Name of Author | डा. गंगा सहाय शर्मा |
Language of Book | Hindi |
Total pages in Ebook) | 1853 |
Size of Book) | 12 MB |
Category | Religious |
Source/Credits | archive.org |
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