Chandragupta Maurya – Biography Book PDF | चन्द्रगुप्त मौर्य – जीवनी

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चंद्रगुप्त मौर्य प्राचीन भारत के एक महान सम्राट थे। उन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, जो भारत के इतिहास में सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसा पूर्व में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत की।

चंद्रगुप्त मौर्य ने सबसे पहले नंद वंश के खिलाफ विद्रोह किया और उन्हें सत्ता से हटा दिया। उन्होंने फिर एक शक्तिशाली सेना का निर्माण किया और अपने साम्राज्य का विस्तार करना शुरू किया। उन्होंने पंजाब, सिंध, कश्मीर, मालवा, गुजरात और उत्तरी भारत के अन्य क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की।

चंद्रगुप्त मौर्य एक कुशल शासक थे। उन्होंने अपने साम्राज्य में शांति और व्यवस्था कायम की। उन्होंने कृषि, व्यापार और उद्योग को प्रोत्साहित किया। उन्होंने शिक्षा और संस्कृति को भी बढ़ावा दिया।

चंद्रगुप्त मौर्य का 297 ईसा पूर्व में निधन हो गया। वह एक महान सम्राट थे और उन्होंने भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह पुस्तक चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन और उपलब्धियों का एक विस्तृत वर्णन करती है। यह पुस्तक उन लोगों के लिए एक must-read है जो प्राचीन भारत के इतिहास में रुचि रखते हैं।

इस पुस्तक को पढ़ने से आप चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन और उपलब्धियों के बारे में अधिक जान सकते हैं। आप यह भी सीख सकते हैं कि उन्होंने कैसे एक महान सम्राट बनने के लिए कड़ी मेहनत की।

अगर आप भारतीय हैं और प्राचीन भारत के इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए एकदम सही है। इसे पढ़कर आप अपने देश के महान इतिहास के बारे में अधिक जान सकते हैं।

Chandragupta Maurya Book PDF in Hindi ( चन्द्रगुप्त मौर्य – जीवनी इन हिंदी ) के बारे में अधिक जानकारी:-

Name of Bookचन्द्रगुप्त मौर्य – जीवनी | Chandragupta Maurya
Name of AuthorDilip Kumar Lal
Language of BookHindi
Total pages in Ebook)86
Size of Book)1 MB
CategoryBiography
Source/Creditsarchive.org

पुस्तक के कुछ अंश (Excerpts From the Book) :-

लगभग 2,500 वर्ष पूर्व भारत छोटे-छोटे गणराज्यों और जनपदों में बँटा हुआ था। आंतरिक कलह और परस्पर दुश्मनी के कारण पूरा देश बिखरता जा रहा था। शासक ऐयाशी करने और धन लुटाने में निमग्न थे, अपनी सारी जिम्मेदारियाँ भूल चुके थे। कुछ महत्त्वाकांक्षी राजा सीमा विस्तार के अभियान में इतने जुटे थे कि प्रजा में असंतोष पनप रहा था। नैतिकता के नाम पर राजाओं का अहंकार विकास की सीढ़ियों को दीमक की तरह चाट रहा था। देश का अस्तित्व खतरे में था। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, कला आदि क्षेत्र अस्थिरता के शिकार थे।

ऐसे में चाणक्य जैसे महान् दार्शनिक, विद्वान्, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री और राष्ट्र हितैषी के रूप में महान् गुरु और चंद्रगुप्त * जैसे महान् सम्राट् का उदय हुआ। उन्हीं दिनों विदेशी शक्तियाँ भारत की ओर लगातार कदम बढ़ा रही थीं। लेकिन इन विषम परिस्थितियों में चाणक्य की दूरदर्शिता काम आई और चंद्रगुप्त मौर्य ने संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बाँधकर नवीन भारत कि स्थापना कि चंद्रगुप्त के पिता, वंश, जन्म-स्थान आदि को लेकर इतिहासकारों और विद्वानों में मतभेद है। फिर भी, माना जाता है कि चंद्रगुप्त के पिता पिप्पलिवन गणराज्य के प्रमुख थे। वे मोरिय वंश के थे। मोरिय वंश से संबंध होने के कारण चंद्रगुप्त के नाम के साथ ‘मौर्य ‘ जुड़ा।

जैन ग्रंथों के अनुसार, ‘मोरिय’ शाक्यों की एक शाखा थी। जब कौसलों के राजकुमार विरूधक ने शाक्यों पर आक्रमण किया था, मोरिय अपना मूल स्थान छोड़कर पिप्पलिवन में बस गए थे। किंवदंती है कि इस स्थान पर प्रचुर संख्या में मोर (पक्षी) पाए जाने के कारण उस वंश का नाम ‘मोरिय’ पड़ा था। पिप्पलिवन मगध का सीमावर्ती गणराज्य था । मगध उन दिनों सबसे शक्तिशाली राज्य था। वहाँ नंद वंश के राजा महापद्मनंद का शासन था।

महापद्मनंद महत्त्वाकांक्षी राजा था। वह सीमावर्ती गणराज्यों को अपने राज्य में मिलाकर मगध का विस्तार कर रहा था। उन्हीं दिनों महापद्मनंद ने पिप्पलिवन गणराज्य के प्रमुख की हत्या कर पिप्पलिवन को अपने राज्य (मगध) में मिला लिया था। जब महापद्म ने पिप्पलिवन पर आक्रमण किया था, उस समय चंद्रगुप्त अपनी माँ मूरा देवी के गर्भ में था । मूरा किसी तरह वहाँ से जान बचाकर भाग निकली और अपने पिता के घर पाटलिपुत्र आ गई। मूरा के पिता मोर – पालक थे। जैन और बौद्ध गं रथों से प्रमाण मिलता है कि पाटलिपुत्र में चंद्रगुप्त का जन्म हुआ था। चंद्रगुप्त के जन्मकाल तक मोरिय वंश का अस्तित्व समाप्त हो चुका था, यानी चंद्रगुप्त के पिता मोरिय वंश के अंतिम उत्तराधिकारी थे।

मूरा को बालक चंद्रगुप्त के पालन-पोषण में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आर्थिक स्थिति डाँवाँ डोल होने से बच्चे के लालन-पालन में कई तरह की मुसीबतें आड़े आई। फिर अपने बच्चे का मनोबल न गिरे, इसके लिए मूरा उसे साहसिक कहानियाँ सुनाया करती थी। बातों-बातों में अहसास कराती थी कि वह कोई साधारण बालक नहीं है। वह राजकुमार है। उसके पिता पिप्पलिवन के राजा थे। वह बच्चे में नंद वंश से प्रतिशोध लेने की भावना प्रेरित करती थी। वह चंद्रगुप्त को अहसास दिलाती थी कि उसके पिता का हत्यारा नंद वंश का राजा महापद्मनंद है।

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