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ब्रह्मवैवर्त पुराण: हिंदी में विस्तृत जानकारी
ब्रह्मवैवर्त पुराण हिन्दू धर्म के 18 प्रमुख पुराणों में से एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह पुराण वेदमार्ग का दसवाँ पुराण है और इसे प्राचीनतम पुराणों में से एक माना जाता है। इस पुराण में संपूर्ण भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल के सभी जीवों के जन्म, मरण और पालन पोषण का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त, ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्री कृष्ण और राधाजी की गोलोक-लीला तथा भगवान श्री राम और माता सीता की साकेत-लीला का भी उल्लेख मिलता है।
रचना और काल
ब्रह्मवैवर्त पुराण एक महत्वपूर्ण वैष्णव ग्रंथ है, जो मुख्य रूप से राधा और कृष्ण पर केंद्रित है। इसका मौजूदा संस्करण संभवतः 15वीं-16वीं शताब्दी में बंगाल क्षेत्र में रचा गया था और बाद में इसे दक्षिण भारत में संशोधित किया गया। इसके कई संस्करण उपलब्ध हैं, जिनमें से प्रत्येक ब्रह्मवैवर्त पुराण की पांडुलिपियों का हिस्सा होने का दावा करता है।
विषयवस्तु
इस पुराण में राधा और कृष्ण को सर्वोच्च वास्तविकता के रूप में पहचाना गया है। विष्णु, शिव, ब्रह्मा और गणेश जैसे देवताओं को कृष्ण के अवतार के रूप में दर्शाया गया है। इसी प्रकार, राधा, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री जैसी देवियों को प्रकृति के अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। यह पुराण राधा के माध्यम से भगवान के स्त्री पहलू को महिमामंडित करता है और यह विचार प्रस्तुत करता है कि सभी महिलाएं दिव्य स्त्री की अभिव्यक्तियाँ हैं।
खण्डों का विभाजन
ब्रह्मवैवर्त पुराण चार खण्डों में विभाजित है:
- ब्रह्म खण्ड: इसमें भगवान श्री कृष्ण की विविध लीलाओं, सृष्टि क्रम और ‘आयुर्वेद संहिता’ का वर्णन है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में राधा का आविर्भाव उनके वाम अंग से दिखाया गया है।
- प्रकृति खण्ड: इसमें सभी देवीओं के आविर्भाव, चरित्र और शक्तियों का सम्पूर्ण वर्णन मिलता है। यह खण्ड यशदुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री और सावित्री के वर्णन से शुरू होता है। इन देवियों को ‘पंचदेवीरूपा प्रकृति’ के नाम से जाना जाता है।
- गणपति खण्ड: इस खण्ड में भगवान गणेशजी के जन्म की कथा, पुण्यक व्रत की महिमा, गणेश जी के चरित्र और लीलाओं का वर्णन है। इसमें गणेशजी के 8 विघ्ननाशक नामों की सूची भी दी गई है।
- श्रीकृष्ण जन्म खण्ड: यह सबसे बड़ा खण्ड है जिसमें 100 अध्याय हैं। इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन है। इस खण्ड में ‘श्रीकृष्ण कवच’ का भी उल्लेख है, जिसका पाठ करने से समस्त भयों का नाश होता है।
आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
ब्रह्मवैवर्त पुराण का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक है। इस पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं जिनकी इच्छा से सृष्टि का जन्म हुआ है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह पुराण महत्वपूर्ण है। इसमें सृष्टि के भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले सभी जीवों के जन्म और पालन पोषण का वर्णन किया गया है। इस पुराण में कहा गया है कि सृष्टि में असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान्यता देते हैं।
निष्कर्ष
ब्रह्मवैवर्त पुराण हिन्दू धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है। इसका अध्ययन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। इसमें वर्णित कथाएं और लीलाएं न केवल भक्ति भाव को बढ़ाती हैं बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डालती हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण हिंदी पीडीऍफ़ ( Brahma Vaivarta Purana PDF Hindi Book) के बारे में अधिक जानकारी:-
Name of Book | ब्रह्मवैवर्त पुराण हिंदी पुस्तक PDF | Brahma Vaivarta Purana PDF Hindi Book |
Name of Author | Geeta Press |
Language of Book | Hindi |
Total pages in Ebook) | 810 |
Size of Book) | 75 MB |
Category | Religious |
Source/Credits | archive.org |
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FAQs
प्रश्न: ब्रह्मवैवर्त पुराण में कितने खण्ड हैं?
उत्तर: ब्रह्मवैवर्त पुराण में चार खण्ड हैं: ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड, गणपति खण्ड और श्रीकृष्ण जन्म खण्ड।
प्रश्न: ब्रह्मवैवर्त पुराण का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इस पुराण का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण और राधाजी की महिमा का वर्णन करना और उनके जीवन की लीलाओं को प्रस्तुत करना है।
प्रश्न: ब्रह्मवैवर्त पुराण किस काल में लिखा गया था?
उत्तर: ब्रह्मवैवर्त पुराण का मौजूदा संस्करण संभवतः 15वीं-16वीं शताब्दी में रचा गया था।
प्रश्न: ब्रह्मवैवर्त पुराण का वैज्ञानिक महत्व क्या है?
उत्तर: इस पुराण में सृष्टि के भू-मंडल, जल-मंडल और वायु-मंडल में विचरण करने वाले सभी जीवों के जन्म और पालन पोषण का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि सृष्टि में असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान्यता देते हैं।
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